अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति ।

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 की न्यायिक शक्ति के तहत अपराध के लिये दोषी करार दिये गए व्यक्ति को राष्ट्रपति क्षमा अर्थात् दंडादेश का निलंबन, प्राणदंड स्थगन, राहत और माफी प्रदान कर सकता है।

लघुकरण (Commutation)

सज़ा की प्रकृति को बदलना जैसे मृत्युदंड को कठोर कारावास में बदलना।

परिहार (Remission)

सज़ा की अवधि को बदलना जैसे 2 वर्ष के कठोर कारावास को 1 वर्ष के कठोर कारावास में बदलना।

विराम (Respite)

विशेष परिस्थितियों की वजह से सज़ा को कम करना जैसे शारीरिक अपंगता या महिलाओं की गर्भावस्था के कारण।

प्रविलंबन (Reprieve)

किसी दंड को कुछ समय के लिये टालने की प्रक्रिया जैसे फाँसी को कुछ समय के लिये टालना।

क्षमा (Pardon)

पूर्णतः माफ़ कर देना, इसका तकनीकी मतलब यह है कि अपराध कभी हुआ ही नहीं।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु मंत्रिपरिषद द्वारा वर्ष 2018 में राज्यपाल को दी गई क्षमादान की सलाह संविधान के अनुच्छेद 161 (राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति) के अंतर्गत राज्यपाल के लिये बाध्यकारी है।

क्षमा याचिका पर निर्णय लेने की राज्यपाल की अनिच्छा ने न्यायालय को पेरारिवलन के साथ न्याय करने के लिये अनुच्छेद 142 के तहत अपनी संवैधानिक शक्तियों को नियोजित करने के लिये बाध्य किया।

पेरारिवलन को रिहा करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया जो न्यायालय को पूर्ण न्याय प्रदान करने हेतु असाधारण शक्तियाँ प्रदान करता है।

न्यायालय ने केंद्र के इस तर्क को खारिज कर दिया कि विशेष रूप से केवल राष्ट्रपति के पास भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत किसी मामले में क्षमादान प्रदान करने की शक्ति है, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि यह विवाद अनुच्छेद 161 को एक “मृत्यु पत्र” के समान बना देगा और एक असाधारण स्थिति पैदा कर देगा जो राज्यपालों द्वारा पिछले 70 वर्षों से हत्या के मामलों में दी गई क्षमा को अमान्य कर देगा।

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