खान और खनिज अधिनियम, 1957 में संशोधन।

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MMDR अधिनियम, 1957 भारत में खनन क्षेत्र को नियंत्रित करता है, साथ ही खनन कार्यों के लिये खनन पट्टे प्राप्त करने एवं देने की आवश्यकता को निर्दिष्ट करता है।

देश की खनिज संपदा के आवंटन में पारदर्शिता और गैर-भेदभाव सुनिश्चित करने के लिये नीलामी के माध्यम से खनिज रियायतें देने की नई व्यवस्था की शुरुआत करने हेतु वर्ष 2015 में अधिनियम में संशोधन किया गया था।

खनिज क्षेत्र को गति देने के लिये वर्ष 2021 में अधिनियम में संशोधन किया गया, सुधारों के तहत सरकार ने खनिज ब्लॉकों की नीलामी, उत्पादन में वृद्धि, देश में व्यापार करने में आसानी तथा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में खनिज उत्पादन के योगदान को बढ़ाने के लिये प्रोत्साहित किया है।

सुधारों में सांविधिक आवश्यकताओं, कैप्टिव खानों से संबंधित अंतिम उपयोग प्रतिबंधों को हटाने, कैप्टिव और गैर-कैप्टिव खानों के बीच विभाजन, खनिज-रियायतों की नीलामी एवं हस्तांतरण, राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET), राष्ट्रीय खनिज सूचकांक (NMI), निजी क्षेत्र को शामिल करना आदि से संबंधित प्रावधान हैं।

न केवल लौह अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर जैसे पारंपरिक खनिजों के लिये बल्कि पृथ्वी के अंदर स्थित खनिजों, उर्वरक खनिजों, संवेदनशील खनिजों के आयात के लिये भी अन्वेषण गतिविधियों में वृद्धि हुई है।

पिछले 4-5 वर्षों में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और खनिज अन्वेषण निगम लिमिटेड जैसी केंद्रीय एजेंसियों ने अन्वेषण के क्षेत्र में कार्य किया और राज्यों को रिपोर्ट सौंपी है।

खनिज

तीन प्रकार की खनिज रियायतें हैं, जैसे- टोही परमिट (RP), पूर्वेक्षण लाइसेंस (PL) और खनन पट्टा (ML)।

RP क्षेत्रीय, हवाई, भूभौतिकीय या भू-रासायनिक सर्वेक्षण और भूवैज्ञानिक मानचित्रण के माध्यम से एक खनिज के प्रारंभिक पूर्वेक्षण के लिये प्रदान किया जाता है।

PL खनिज जमा की खोज, पता लगाने या साबित करने के उद्देश्य से संचालन के लिये दिया जाता है।

ML किसी भी खनिज के संचालन हेतु दिया जाता है।

खनिज स्वीकृति से संबंधित प्रमुख बिंदु

अनुमोदन से ग्लूकोनाइट, पोटाश, एमराल्ड, प्लेटिनम ग्रुप ऑफ मेटल्स, अंडालूसाइट और मोलिब्डेनम के संबंध में खनिज ब्लॉकों की नीलामी सुनिश्चित होगी जिससे मूल्यवान विदेशी मुद्रा भंडार की बचत करने वाले इन खनिजों के आयात में कमी आएगी।

ग्लूकोनाइट और पोटाश का उपयोग कृषि में उर्वरक के रूप में किया जाता है, धातुओं के प्लेटिनम समूह और अंडालूसाइट और मोलिब्डेनम उद्योगों में उपयोग किये जाने वाले उच्च मूल्य वाले खनिज हैं।

खान मंत्रालय ने खदानों की नीलामी में बेहतर भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिये रॉयल्टी की उचित दरों का प्रस्ताव किया है।

रॉयल्टी एक ऐसा शुल्क है जो स्थानीय, राज्य या संघीय सरकारों द्वारा किसी खदान में उत्पादित खनिजों की मात्रा या खदान से बेचे गए खनिजों से प्राप्त राजस्व या लाभ पर लगाया जाता है।

खान मंत्रालय इन खनिज ब्लॉकों की नीलामी को सक्षम करने के लिये आवश्यक खनिजों के औसत बिक्री मूल्य (ASP) की गणना हेतु एक पद्धति प्रदान करेगा।

अंडालूसाइट, सिलीमैनाइट और कायनाइट, जो कि पॉलीमॉर्फ खनिज हैं, के लिये रॉयल्टी की दर समान स्तर पर रखी जाती है।

पॉलीमॉर्फ एक ही रासायनिक संरचना वाले ऐसे खनिज होते हैं, जिनकी क्रिस्टल संरचनाएँ अलग होती हैं।

इस अनुमोदन से खनन क्षेत्र के साथ-साथ विनिर्माण क्षेत्र में सशक्तीकरण के अवसर पैदा करने में मदद मिलेगी, जो समाज के एक बड़े वर्ग के समावेशी विकास को सुनिश्चित करने में मदद करेगा।

इस मंज़ूरी से देश में पहली बार ग्लूकोनाइट, पोटाश, एमराल्ड, प्लेटिनम ग्रुप ऑफ मेटल्स, अंडालूसाइट और मोलिब्डेनम के खनिज ब्लॉकों की नीलामी सुनिश्चित होगी।

भारत में खनिजों का नियमन

  • •राज्य की सीमा के भीतर स्थित खनिजों का स्वामित्व संबंधित राज्य सरकार के पास हैं।

ज़िला खनिज फाउंडेशन’ भारत में राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचना के माध्यम से स्थापित वैधानिक निकाय हैं। वे खान एवं खनिज (विकास व विनियमन) अधिनियम, 1957 से अपनी कानूनी स्थिति प्राप्त करते हैं।

ज़िला खनिज फाउंडेशन’ का उद्देश्य खनन से संबंधित कार्यों से प्रभावित व्यक्तियों और क्षेत्रों के हित में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित तरीके से काम करना है।

• प्रादेशिक जल या भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र के भीतर समुद्र के नीचे के खनिजों पर केंद्र सरकार का स्वामित्त्व है।

इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी’ (ISA) वह संगठन है, जिसके माध्यम से UNCLOS के सदस्य समग्र मानव जाति के लाभ हेतु क्षेत्र में सभी खनिज-संसाधन-संबंधित गतिविधियों का आयोजन एवं नियंत्रण करते हैं।

खनिज रियायतें प्रदान करना और नियम

राज्य सरकारें खान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1957 तथा खनिज रियायत नियम, 1960 के प्रावधानों के तहत राज्य की सीमा के भीतर स्थित सभी खनिजों के लिये खनिज रियायतें प्रदान करती हैं।

हालांँकि खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की पहली अनुसूची में निर्दिष्ट खनिजों के लिये केंद्र सरकार का अनुमोदन आवश्यक है। अनुसूची I में कोयला और लिग्नाइट जैसे खनिज तथा यूरेनियम और थोरियम युक्त “दुर्लभ मृदा” समूह के खनिज शामिल हैं।

इसके अलावा केंद्र सरकार समय-समय पर कुछ खनिजों को ‘लघु’ खनिजों के रूप में अधिसूचित करती है, जिसके लिये आवेदन प्राप्त करने और अनुदान देने की प्रक्रियाओं पर निर्णय लेने की पूर्ण शक्तियांँ केंद्र के पास है।

रियायतें, रॉयल्टी की दरें तय करना, निर्धारित किराया और आदेशों को संशोधित करने की शक्ति केवल राज्य सरकार के पास है।

लघु खनिजों के उदाहरणों में भवन निर्माण में प्रयोग होने वाले पत्थर, बजरी, साधारण मिट्टी व रेत शामिल हैं।

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