भारत में बेनामी संपत्ति अधिनियम।

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बेनामी संपत्ति मूलतः वो संपत्ति होती है, जो किसी व्यक्ति के नाम पर नहीं होती है. यानि किसी व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल की जा रही संपत्ति, जो उसके नाम पर पंजीकृत नहीं है, वो बेनामी संपत्ति के अंतर्गत आएगी।

कभी कभी ये संपत्ति, इस्तेमाल कर रहे व्यक्ति के पति या पत्नी के नाम पर भी हो सकती है, जिसे खरीदते समय इस्तेमाल किये गए धन के स्त्रोत का कुछ पता नहीं चल पाता. यदि कोई संपत्ति भाई, बहन या अन्य किसी रिश्तेदार के साथ ली गयी है, जिसे संयुक्त संपत्ति (जॉइंट प्रॉपर्टी) भी कहते हैं. लेकिन उस संपत्ति को खरीदने के लिए दिए गये पैसे का विवरण न हो, तो ये बेनामी संपत्ति के अंतर्गत आता है।

इसके अलावा इसी तरह के कई अन्य संपत्ति जिसके स्त्रोत की जानकारियाँ नहीं होती है, लेकिन उसका इस्तेमाल किसी के द्वारा किया जा रहा है, वे सब बेनामी संपत्ति के तहत आएगी।

कुछ लोग अपने टैक्स बचाने के लिए अपने काले धन का इस्तेमाल कई तरह की संपत्तियां खरीदने में करते हैं. इस तरह से खरीदी गयी संपत्तियां बेनामी संपत्ति में आती है।

इन संपत्तियों के असली मालिक का पता नहीं चल पाता, क्योंकि इस तरह से संपत्तियां खरीदने वाले लोग इस काम के लिए कई अलग अलग नाम और पहचान का इस्तेमाल करते हैं।

जो आदमी इस तरह से बेनामी संपत्ति ख़रीदता है उसे ‘बेनामदार’ कहा जाता है. ऐसे बेनामी लेन देन कई रूपों में होते हैं. ये संपत्तियां गतिशील, स्थापित, वास्तविक, अवास्तविक वस्तुओं या किसी दस्तावेज़ के रूप में हो सकती है।

भारत में बेनामी संपत्ति के लिए अधिनियम

बेनामी संपत्ति अधिनियम 1988

इस अधिनियम को बेनामी ट्रांसक्शन (प्रोहिबीशन) एक्ट 1998 के नाम से भी जाना जाता है।

ये जम्मू और कश्मीर के अलावा भारत के सभी राज्यों में पारित हुआ था. सेक्शन 3, 5 और 8 का प्रावधान एक साथ सभी जगहों पर 19 मई 1988 से पारित हुआ।

बेनामी ट्रांसक्शन का मतलब ऐसा कोई ट्रांसक्शन है, जिसमे एक आदमी किसी दूसरे आदमी से किसी प्रॉपर्टी को किसी तरह के लाभ के लिए लेना बताता है, तो वह बेनामी संपत्ति कहलाएगी।

सम्पति अर्थात किसी भी तरह की संपत्ति गतिशील, स्थापित, वास्तविक, अवास्तविक और किसी तरह के हक़ या रूचि के अधीन हो।

बेनामी संपत्ति बिल 2015

बेनामी संपत्ति बिल 2015 के तहत ऐसी शर्त, जिसके अधीन कोई संपत्ति बेनामी होने से बच सकती है, इस बिल में कुछ ऐसे निर्दिष्ट घटनाओं का भी वर्णन है जिसके अंतर्गत कोई भी संपत्ति बेनामी सम्पत्ति घोषित होने से मुक्त हो सकती है।

किसी संयुक्त परिवार का एक सदस्य जो अपने परिवार के किसी और सदस्य की संपत्ति अपने नाम रखता है, और परिवार की सारी कमाई एक साथ दिखाई जाती है।

किसी आदमी की उसकी बीवी अथवा बच्चे के लिए खरीदी गयी संपत्ति जिसे ख़रीदने के लिए आदमी ख़ुद अपनी कमाई से भुगतान कर रहा हो।

बेनामी संपत्ति एक्ट 2016

बेनामी संपत्ति एक्ट 2016 बेनामी संपत्ति एक्ट 1988 का संशोधित रूप है।

इस नये अधिनियम के तहत संपत्ति की कोई भी ऐसी लेन देन जिसमे असली मालिक कुछ पैसों के लालच देकर किसी अन्य आदमी के नाम पर अपनी संपत्ति रखता है, वो बेनामी संपत्ति के अंतर्गत आती है. ऐसे ट्रांसक्शन अक्सर अवैध नामों की सहायता से किये जाते हैं।

बेनामी संपत्ति पर कानूनी कार्यवाही

कोई भी आदमी किसी भी तरह के बेनामी लेन- देन में हिस्सा नहीं लेगा।

किसी भी तरह से अपनी पत्नी अथवा बच्चे के नाम से कोई संपत्ति खरीदने पर यह संपत्ति तब तक परिकल्पित रहेगी, जब तक इस सत्य का ज्ञापन न हो जाए कि यह संपत्ति वाकई पत्नी अथवा बच्चे के लाभ के लिए खरीदी गयी है।

जो भी व्यक्ति इस तरह के लेन देन में भागीदार रहेगा उसे भारतीय क़ानून के इस अधिनियम के तहत दण्डित किया जाएगा. दंड के तौर पर कम से कम तीन साल कारावास की सजा या न्यायालय द्वारा आदेश दिए गये दंड शुल्क अथवा दोनों ही दिया जा सकता है।

कारावास तीन साल से अधिक का भी हो सकता है, इस दंड के दौरान मुजरिम को जमानत नहीं मिल सकेगी।

बेनामी संपत्ति का मानदंड

यदि कोई आदमी अपनी किसी भी तरह की संपत्ति का मालिक किसी और आदमी को बना देता है, और उस आदमी को इस काम के लिए किसी तरह का लाभ देता है तो ऐसी सम्पत्तियां बेनामी संपत्ति के अंतर्गत आती हैं।

कई लोग अपने आयकर बचाने के लिए अपने काले धन का इस्तेमाल कई तरह की सम्पत्तियो को खरीदने में करते हैं. ये संपत्तियां वे अक्सर अवैध नामों और डुप्लीकेट दस्तावेज़ों की सहायता से करते हैं. ऐसी संपत्तियां बेनामी संपत्ति के अंतर्गत आती हैं।

यदि किसी संपत्ति को कोई आदमी अपने कमाए हुए पैसे से अपने किसी रिश्तेदार के नाम से ख़रीदता है तो वो संपत्ति भी बेनामी संपत्ति के अंतर्गत आएगी।

बेनामी संपत्ति के जांच आयोग

इस अधिनियम के तहत चार ऐसे आयोग का गठन हुआ है जो बेनामी संपत्ति की जांच अथवा छान- बीन करते हैं।

इनिशिएटिंग ऑफिसर यानि पहल अधिकारी

अप्प्रूविंग अथॉरिटी यानि प्राधिकरण की मंजूरी

एड्मिनिसट्रेटर अथॉरिटी यानि प्रशासन प्राधिकरण

एडजुडीकेटिंग अथॉरिटी

सबसे पहले इनिशिएटिंग ऑफिसर यानि पहल अधिकारी निर्दिष्ट जगह पर, जहाँ बेनामी संपत्ति होने की आशंका है वहाँ की तहकीकात करते हैं. और फिर वे संपत्ति बेनामी प्रामाणित हो जाने पर सारे रिपोर्ट अप्प्रूविंग अथॉरिटी के हाथ दे देते हैं।

इसके बाद आगे की कार्यवाही में एड्मिनिसट्रेटर अथॉरिटी और एडजुडीकेटिंग अथॉरिटी भाग लेता है. इस तरह बेनामी संपत्ति की जाँच की जाती है।

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