रिश्ते में खटास आने पर दुष्कर्म का केस दर्ज नहीं करा सकती महिला।

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सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़, एक महिला जो किसी पुरुष के साथ रिश्ते में थी और स्वेच्छा से उसके साथ रह रही थी, वह रिश्ते में खटास आने पर दुष्कर्म का मामला दर्ज नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ ही दुष्कर्म, अप्राकृतिक अपराधों और आपराधिक धमकी के आरोप को सही नही बताया।

कोर्ट ने कहा कि रिश्तों में इस बदलाव के कारण इन जोड़ों के टूटने और दूसरों से शादी करने के बाद बलात्कार के आरोपों की संख्या बढ़ रही है। हालांकि, इसका हमेशा यह अर्थ नहीं होता है कि किसी एक साथी को शादी के झूठे वादे पर यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया था।

रिश्ते में खटास आने को बलात्कार नहीं माना जाएगा, वर्तमान सामाजिक संदर्भ में, हमारे पास लिव-इन रिलेशनशिप और ओपन मैरिज हैं, व्यावहारिक रूप से, शादी की उम्र भी अब बदल गई है, 28 साल या 29 साल की लड़कियां इन दिनों शादी के लिए तैयार नहीं हैं।

वे अपनी आजादी का आनंद ले रहे हैं, लेकिन मुश्किल यह है कि बलात्कार के आरोप हमेशा तब सामने आते हैं, जब ये रिश्ते कड़वे हो जाते हैं।

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, एक महिला जो किसी पुरुष के साथ रिश्ते में थी और स्वेच्छा से उसके साथ रह रही थी, वह रिश्ते में खटास आने पर दुष्कर्म का मामला दर्ज नहीं कर सकती, सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ ही दुष्कर्म, अप्राकृतिक अपराधों और आपराधिक धमकी के आरोपी अंसार मोहम्मद को अग्रिम जमानत दे दी।

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने अपने आदेश में कहा, शिकायतकर्ता स्वेच्छा से अपीलकर्ता के साथ रह रही थी और रिश्ते में थी, इसलिए अब यदि संबंध में खटास आ गई तो यह आईपीसी की धारा-376 (2) (N) अपराध के लिए प्राथमिकी दर्ज करने का आधार नहीं हो सकता है।

अदालत ने अपील को स्वीकार किया और राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को दरकिनार कर दिया जिसमें अपीलकर्ता को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इन्कार कर दिया था। राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (crpc) की धारा-438 के तहत अग्रिम जमानत के लिए दायर अंसार की याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

अदालत का तर्क

हाईकोर्ट ने कहा था, यह एक स्वीकृत स्थिति है कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता से शादी करने का वादा करके उसके साथ संबंध बनाए थे और उनके संबंध के कारण एक बच्चे का जन्म हुआ था। इसलिए अपराध की गंभीरता को देखते हुए हम याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत देने का उपयुक्त मामला नहीं मानते।

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि कहा, शिकायतकर्ता ने यह स्वीकार किया है कि वह चार साल तक अपीलकर्ता के साथ रिश्ते में थी और जब रिश्ता शुरू हुआ तब उसकी उम्र 21 साल थी। शीर्ष अदालत ने इन बातों को ध्यान में रखते हुए अपीलकर्ता को अग्रिम जमानत देने का फैसला किया।

असाधारण शक्तियों के गलत इस्तेमाल को ध्यान में रखके फैसले के खिलाफ सुनवाई ज़रूरी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून का उपयोग करके किसी पर लगाए गए जुट्ठे आरोप को ध्यान में रखके फैसला करना जरूरी

फैसले के खिलाफ सुनवाई में असाधारण शक्तियों के इस्तेमाल में संयम जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, किसी फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते वक्त संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत उसे मिली असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल बड़े संयम से किया जाना चाहिए, ताकि न्याय की हत्या न हो, इसमें देश के किसी भी कोर्ट, न्यायाधिकरण आदि के फैसले शामिल हैं।

जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने हत्या के दोषी मेकाला शिवैया की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, शिवैया को निचली अदालत व हाईकोर्ट ने अमरावती की सब्जी मंडी में 6 सितंबर 2006 को एक किसान की हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

शिवैया ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जस्टिस कृष्ण मुरारी ने आदेश में लिखा, अनुच्छेद 136 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल कर दखल तब ही दिया जा सकता है जब पहले कोर्ट के फैसलों में कोई गलती हो।

साथ ही इस बात का ध्यान देना होता है कि कहीं दखल से न्याय की हत्या न हो, पिछले फैसलों का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा, साक्ष्यों की दोबारा जांच कराना सुप्रीम कोर्ट का काम ही नहीं हैं, हम सिर्फ ये देखते हैं कि निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला सही है या नहीं।

ऐसा सिर्फ दुर्लभ और बेहद असाधारण मामलों में होता है जहां गलत तरह से देखने या साक्ष्यों की अनदेखी के कारण फैसलों में न्याय की हत्या होती है, यह कोर्ट ऐसी ही स्थिति में साक्ष्यों की दोबारा जांच कराती है।

पीठ ने कहा, इन फैसलों में सांविधानिक योजना का सही शब्दों में उल्लेख किया गया है और स्पष्ट किया गया है कि इस अनुच्छेद के तहत मिली शक्तियों को किसी भी तकनीकी बाधा से बाधित नहीं किया जा सकता, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट हर आपराधिक मामले में अपील वाले नियमित कोर्ट की तरह काम नहीं करता।

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