Domestic Violence Act 2005|घरेलू हिंसा अधिनियम क्या है ?

0
107

घरेलू हिंसा (अधिनियम) कानून के तहत प्रतिवादियों की गिरफ्तारी नही होती हे, लेकिन इसके अंतर्गत पीडि़त महिला को भरण-पोषण, निवास एवं बच्चों के लिये अस्थायी संरक्षण की सुविधा को दिलाने का प्रावधान किया गया है।

घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 में स्थापित, इस अधिनियम से महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू रिश्तों में महिलाओं को हिंसा से बचाने के उद्देश्य से सांसद द्वारा बनाया गया एक कानून है।

यह ऐसा कानून है जिसमे शिकायत करते ही पीड़ित को उस अन्याय की व्यवस्था से बाहर निकाल कर सुरक्षित किया जाता है, जब तक केस में सच-झूठ के आधार पर दीर्घकालिक न्यायपूर्ण फैसला न हो जाए।

इस कानून को भारत की संसद द्वारा 13 सितम्बर 2005 में स्वीकृत और 26 अक्टूबर 2006 को लागू किया गया |

यहाँ पर समझने वाली एक महत्वपूर्ण बात ये है कि इस कानून का उद्देश्य महिलाओं को रिश्तदारों के दुर्व्यवहार से संरक्षित करना है, इसलिये यह समझना भी ज़रूरी है कि घरेलू रिश्तेदारी या संबंध क्या है?

घरेलू रिश्तेदारी’ का आशय किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच के उन संबंधों से है, जिसमें वे या तो साझी गृहस्थी में एक साथ रहते हैं या पहले कभी रह चुके होते हैं।

घरेलू हिंसा क्या है ?

घरेलू हिंसा अर्थात् कोई भी ऐसा कार्य जो किसी महिला एवं बच्चे (18 वर्ष से कम आयु के बालक एवं बालिका) के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन के संकट, आर्थिक क्षति और ऐसी क्षति जो असहनीय हो तथा जिससे महिला व बच्चे को दुःख एवं अपमान सहना पड़े, इन सभी को घरेलू हिंसा के दायरे में शामिल किया जाता है।

शारीरिक : (मार-पीट, थप्पड़ मारना, डाँटना, दाँत काटना, ठोकर मारना, अंग को नुक्सान पहुंचाने संबंधी, स्वास्थ्य को हानि)।

मानसिक : ( चरित्र, आचरण पर दोष, अपमानित, लड़का न होने पर प्रताड़ित, नौकरी छोड़ने या करने के लिए दबाव, आत्महत्या का डर देना,घर से बाहर निकाल देना)।

शाब्दिक या भावनात्मक : (गाली-गलोच, अपमानित)।

लैंगिक : ( बलात्कार, जबरदस्ती संबंध बनाना, अश्लील सामग्री या साहित्य देखने को मजबूर करना,अपमानित लैंगिक व्यवहार, बालकों के साथ लैंगिक दुर्व्यवहार)।

आर्थिक : ( दहेज़ की मांग, महंगी वस्तु की मांग, सम्पति की मांग, आपको या आपके बच्चे के खर्च के लिए आर्थिक सहायता न देना ,रोजगार न करने देना या मुश्किल पैदा करना ,आय-वेतन आपसे ले लेना, संपत्ति से बेदखल करना)।

पीड़ित कौन है ?

एकल या संयुक्त परिवार की किसी भी महिला (माँ, बेटी(अपनी,सौतेली,गोद ली), बहन, विधवा औरत, कुँवारी लड़की, यहां तक कि लिव इन संबंधों या अवैध शादी संबंधों में रहने वाली महिला चाहे वो एक ही घर में रह रहे हों या नहीं , कार्यस्थल पर काम करती महिला) बच्चे (गोद लिए, सौतेले, रिश्तेदारों के, संयुक्त परिवार से किसी भी संबंध के, स्कूल वगैरह के संबंध में)।

दोषी कौन है ?

पीड़ा देने वाला (महिला/बच्चे के संबंध में कोई भी पुरुष या महिला जैसे पति, पिता, बेटा, भाई, संयुक्त परिवार का कोई भी पुरुष सदस्य या महिला सदस्य सास, ननद, जेठानी, देवरानी भी हो सकता/सकती है)।

घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत कैसे करें ?

अधिनियम में फॉर्म 1 में दी गई रिपोर्ट अनुसार हम शिकायत कर सकते है | उसमें पीड़िता/पीड़ित का नाम, आयु, पता, फोन नंबर, बच्चों की जानकारी,घरेलु हिंसा की घटना के बारे में पूरी जानकारी तथा संबंधित दस्तावेज़ लगा कर, उस पर हस्ताक्षर करने के बाद यह प्रार्थना पत्र प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को जमा करवानी पड़ती है।

जिसकी एक-एक प्रति अपने पास, स्थानीय पुलिस थाने, सुरक्षा अधिकारी या सेवा सहायक को भी देनी पड़ती है।

मजिस्ट्रेट, पीड़ित के घर की, कार्यस्थल की स्थानीय सीमा या दोषी व्यक्ति के घर की/दफ्तर की स्थानीय सीमा से संबंधित हो सकता है या जहां हिंसा हुई उस क्षेत्र की सीमा में भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है।

परन्तु संबंधित मजिस्ट्रेट कहीं के भी हों पर उनके आदेश पूरे भारत की सीमा के अंदर हर जगह मान्य होगे।

यह शिकायत पीड़ित/पीड़िता स्वयं, उसके संबंधी या पड़ोसी, राज्य द्वारा नियुक्त सुरक्षा अधिकारी, सेवा सहायक कोई भी इसकी शिकायत स्वयं संबंधित दफ्तर में जाकर, संबंधित दफ्तर या अधिकारी की ई.मेल, जारी किए गए फोन नंबर पर भी दे सकता है।

घरेलू हिंसा अधिनियम की क़ानूनी धाराएं

धारा 4 : इस धारा केअनुसार पीड़ित न्याय के लिए पुलिस अधिकारी, मजिस्ट्रेट से अपने या दोषी के संबंधित क्षेत्र में शिकायत दर्ज कर सकता/सकती है।

धारा 5,6,7,9 : इस धारा के अनुसार पीड़ित को सरंक्षण का आदेश प्राप्त करने, सेवा सहायक की नियुक्ति, सरंक्षण अधिकारी की नियुक्ति, मुफ्त कानूनी सहायता संबधित अधिकारों की जानकारी मुहैया करवाई जाती है। और ये सब अपने दायित्व को अच्छी तरह निभाएंगे।

धारा 10 : इस धारा के अनुसार संबंधित अधिकारी मजिस्ट्रेट को आगे सूचित करेगा।

धारा 12 : इस धारा में मुआवजे या नुकसान का आवेदन करना बताया गया है ।

धारा 14,15 : इस धारा में मजिस्ट्रेट पीड़ित को सेवा सहायक की मदद के लिए निर्देश दिए गए हैं |

धारा 16 : इस धारा में बताया गया है कि पक्षकार चाहें तो कार्यवाही बंद कमरे में हो सकती है।

धारा 17-18 : इस धारा में पीड़ित को सांझी गृहस्थी में निवास का अधिकार।

धारा 19 : इस धारा में स्थानीय थाने को पीड़ित और उसके बच्चे के सरंक्षण के लिए निवास या भुगतान का आदेश है।

धारा 20-22 : इस धारा में वित्तीय असंतोष की भरपाई का आदेश है।

धारा 21 : इस धारा में संतान के संबंध में या मिलने संबंधी बात कही गयी है।

धारा 24 : इस धारा में पक्षकारों को आदेश की प्रति निःशुल्क देना।

फरियाद के बाद मजिस्ट्रेट निम्न आदेश दे सकते

सरंक्षण (प्रोटैक्शन) आदेश, अभिरक्षा (कस्टडी) आदेश, निवास का आदेश, आर्थिक भरण पोषण देने का आदेश।

आपके लिए सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति, और सलाहकार समिति बनाने के आदेश दे सकते है।

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here