FIR से लेकर रिट तक, कब शिकायत करें, कोर्ट कब जाए।

0
114

किसी व्यक्ति के साथ अगर गलत होता है तो उसके सामने ये तय करना मुश्किल होता है कि वो न्याय के लिए कहां जाए। हर मामले में कोर्ट या थाने जाना आवश्यक है।

पुलिस से कब शिकायत करें ?

अगर मामला असंज्ञेय श्रेणी का हो जैसे मामूली मारपीट, आपराधिक मानहानी, धक्कामुक्की आदि तो ऐसे मामले में सीधे केस दर्ज नहीं होता है बल्कि पुलिस के सामने शिकायत करने पर पुलिस नॉन कॉग्नेजेबल रिपोर्ट (Non-Cognizable Report) यानी NCR दर्ज कर सकती है और मामले में जरूरत पड़ने पर मैजिस्ट्रेट को रेफर कर दिया जाता है।

जब मामला संज्ञेय अपराध का हो यानी गंभीर अपराध हो जैसे गैर जमानती अपराध हत्या, रेप, लूट, डकैती, या अन्य गंभीर किश्म के अपराध हों तो वैसे मामले में पुलिस शिकायत पर सीधे FIR दर्ज करती है।

सीआरपीसी की धारा-154 (CRPC Section 154) के तहत पुलिस की ड्यूटी है कि वह संज्ञेय अपराध के मामले में केस दर्ज करे।

पुलिस शिकायत ना दर्ज करे तो क्या करे।

अगर गंभीर व संज्ञेय अपराध में पुलिस केस दर्ज करने से मना करती है तो शिकायती इलाके के SP या DCP को शिकायत भेज सकता है।

अगर पुलिस के आला अधिकारी को कहने और शिकायत करने पर भी केस दर्ज नहीं किया जाता है तो शिकायती कंप्लेंट की कॉपी के साथ वकील की मदद से संबंधित थाने के मैजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी की धारा-156 (3) (CRPC Section-156(3) में शिकायत कर सकता है और फिर कोर्ट शिकायत से संतुष्ट होने पर केस दर्ज करने का हुक्म देती है।

जीरो FIR क्या है ?

अगर शिकायती के साथ किया गया अपराध उस थाने की जूरिस्डिक्शन में नहीं हुआ हो, जहां शिकायत लेकर शिकायती पहुंचता है, तो भी पुलिस को शिकायती की शिकायत के आधार पर केस दर्ज करना होगा।

मामला अगर संज्ञेय अपराध से जुड़ा हो, तो चाहे अपराध देश के किसी इलाके में क्यों न हुआ हो, किसी भी दूसरे इलाके में केस दर्ज हो सकता है।

पुलिस को अपराध के बारे में सूचना देने में देरी न हो, इसलिए जरूरी है कि उस शिकायत को दर्ज किया जाए।

पुलिस न सिर्फ FIR करेगी बल्कि वह शुरुआती जांच भी करेगी ताकि शुरुआती साक्ष्य नष्ट न हों।

पुलिस इस तरह की जांच के बाद जांच रिपोर्ट और एफआईआर को संबंधित थाने को रेफर करती है। इस प्रक्रिया में दर्ज FIR जीरो FIR (Zero FIR) कहा जाता है।

कंज्यूमर कोर्ट में कब जाएं ?

जब मामला उपभोक्ता के अधिकार से जुड़ा हुआ हो तो मामले में थाने में या किसी अदालत में नहीं शिकायत होती है बल्कि उसके लिए देश के हर जिले में बनाए गए जिला उपभोक्ता अदालत में शिकायत की जा सकती है।

उपभोक्ता अधिकारों का हनन हुआ है तो थाने में नहीं बल्कि ऐसे मामले में शिकायती खुद भी इलाके के कंज्यूमर फोरम (Consumer Forum) में केस दायर कर सकता है यानी लिखित शिकायत कर सकता है।

कंज्यूमर कोर्ट उस शिकायत के आधार पर प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर सकता है, शिकायती चाहे तो शिकायत या याचिका के लिए वकील की मदद ले सकता है।

हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा कब खटखटाया जा सकता है ?

अगर मामला किसी के मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ हो। चाहे किसी व्यक्ति विशेष का मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) का हनन हो रहा हो या फिर व्यापक जनहित में लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा हो तो ऐसे मामले में सीधे इलाके के हाई कोर्ट में अनुच्छेद-226 (Article-226) के तहत रिट दाखिल (Writ File) की जा सकती है या फिर मामला अगर दो राज्यों से जुड़ा हो या देशव्यापी हो तो सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अनुच्छेद-32 (Article-32) के तहत रिट दाखिल की जा सकती है।

किसी के भी मौलिक अधिकारों के हनन के मामले में अनुच्छेद-226 व 32 का सहारा लिया जा सकता है।

लेकिन साथ ही अगर मामला जनहित से जुडा़ हो तो इन्हीं दोनों अनुच्छेद के सहारे PIL (Public Interest Ligitation) यानी जनहित याचिका दायर की जाती है।

जनहित याचिका या मौलिक अधिकार के हनन के मामले में निचली अदालत में रिट दाखिल नहीं होती है बल्कि सीधे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जाती है।

लेटर से भी PIL दाखिल होती है ?

अगर मामला जनहित से जुड़ा हुआ हो तो देश का कोई नागरिक उस मामले में लेटर लिखकर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को मामले से अवगत करा सकता है।

हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जब लेटर पहुंचता है तो उसे स्क्रूटनी की जाती है और हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को जब उचित लगे तो वह उसे जनहित याचिका में तब्दील कर सकती है।

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here