Geneva Conventions|जेनेवा समझौता क्या है ?

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जेनेवा समझौता दो देशों के बीच युद्ध के दौरान किया गया एक समझौता है, जिसमें 4 समझौते और 3 प्रोटोकॉल शामिल है. इसके तहत युद्ध में मानवीय उपचार के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के स्टैण्डर्ड को स्थापित किया जाता हैं।

जब दो देशों के बीच युद्ध होता है, और युद्ध के दौरान कोई सैनिक या नागरिक यदि सीमा पार यानि दुश्मन देश की सीमा में पहुँच जाता है, तो उस पर अंतर्राष्ट्रीय कानून लागू हो जाता है, और उस सैनिक को प्रिजनर ऑफ़ वॉर भी कहा जाता है, इस कानून के तहत कुछ नियम बनाये गये हैं, जिसमें यह कहा गया है, कि दुश्मन देश द्वारा उन सैनिक के साथ कैसा बर्ताव किया जाना चाहिए एवं सैनिक को उसके देश में वापस कैसे भेजना चाहिए।

जेनेवा समझौते का इतिहास (Geneva Convention History)

जेनेवा समझौते का इतिहास कई साल पुराना है, एक बार स्विस व्यापारी हेनरी दुनांत जोकि, एक सामाजिक कार्यकर्ता, रेड क्रॉस के संस्थापक एवं पहला नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त करने वाले व्यक्ति थे, ये सन 1859 में सोलफेरिनो की लड़ाई के बाद घायल सैनिकों से मिलने गए।

इन सैनिकों की मदद के लिए उपलब्ध सुविधाओं, सुरक्षा कर्मियों और चिकित्सा सहायता की कमी से हैरान थे. परिणामस्वरुप उन्होंने 1862 में युद्ध के डरावने दृश्य पर अपनी एक पुस्तक ‘ए मेमोरी ऑफ़ सोलफेरिनो’ प्रकाशित की, उस पुस्तक में उन्होंने युद्धकाल के अनुभवों पर अपने विचार प्रकट किये थे।

इन्ही अनुभवों से उनके मन में जेनेवा समझौते के प्रस्ताव का विचार भी प्रकट हुआ, जिसे उन्होंने लोगों के बीच में प्रस्तुत किया. इसके बाद जब भी जेनेवा समझौते का संशोधन किया गया, वह अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस द्वारा ही किया गया।

जेनेवा समझौते की जानकारी (Geneva Convention Details)

पहला जेनेवा समझौता (first Geneva convention)

यह समझौता ‘युद्ध में सशस्त्र बलों में घायल और बीमार लोगों की स्थिति में सुधार के लिए’ सन 1864 में पहली बार लागू किया गया, इसके बाद इसका 3 बार और अपडेशन किया गया. दरअसल इसे सन 1864 के बाद सन 1906 में और फिर सन 1929 में संशोधित किया गया था. फिर सन 1949 में यह पूरी तरह से फाइनल हो गया।

दूसरा जेनेवा समझौता (Second Geneva convention)

यह वह समझौता था, जिसमें ‘समुद्र में सशस्त्र बलों के घायल, बीमार और शिपव्रेक सदस्यों की स्थिति में सुधार के लिए’ सन 1906-07 में दूसरे जेनेवा समझौते के रूप में प्रस्तावित किया गया था, यह समुद्री युद्ध के पीढितों की सुरक्षा पर पहला जेनेवा समझौता था, जोकि पहले जेनेवा समझौते की तरह ही काम करता था, इस समझौते को हैग समझौता भी कहा जाता है, इसे भी सन 1949 में पूरी तरह से लागू किया गया।

तीसरा जेनेवा समझौता

तीसरा जेनेवा समझौता : इस तीसरे जेनेवा समझौते को “युद्ध या युद्ध के अलावा किसी अन्य आर्मी लड़ाई में कैदियों के उपचार या प्रिजनर ऑफ़ वॉर के लिए” लागू किया गया था, इस समझौते के तहत युद्धबंदी सैनिक जिसे प्रिजनर ऑफ़ वॉर भी कहा जाता है, को उसके अपने देश में वापस भेज दिये जाने के बारे में कहा गया है, इस समझौते ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सन 1949 में सन 1929 के जेनेवा समझौते की जगह ली।

चौथा जेनेवा समझौता

इसके बाद इन तीनों समझौते के अतिरिक्त कोफेरेंस में एक चौथे जेनेवा समझौते को लागू करने का प्रस्ताव रखा गया था, जोकि ‘युद्ध के समय में नागरिकों की सुरक्षा के लिए’ था, यह पहला जेनेवा समझौता था, जोकि किसी लड़ाई से निपटने के लिए नहीं था, बल्कि इसका विषय नागरिकों की सुरक्षा थी, हालाँकि सन 1899 एवं सन 1907 के समझौते में पहले से ही नागरिकों एवं अधिकृत क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए कुछ प्रावधान थे. जिनेवा समझौते के लेख 154 में विशेष रूप से चौथे जेनेवा समझौते के बारे में विस्तार से समझाया गया है।

इस तरह से यह कई साल तक संसोधित कर लागू होता गया, फिर यह पूरी तरह से 12 अगस्त सन 1949 में ‘जेनेवा समझौते’ के रूप में लागू हुआ, जिस पर 196 देशों के द्वारा हस्ताक्षर किये गये थे।

प्रोटोकॉल्स

सन 1949 के समझौते को 3 संशोधन प्रोटोकॉल के साथ संशोधित किया गया था।

प्रोटोकॉल 1 :

पहला प्रोटोकॉल सन 1977 में अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र लड़ाइयों में पीढितों की सुरक्षा से सम्बंधित था।

प्रोटोकॉल 2 :

दूसरा प्रोटोकॉल भी सन 1977 में गैर अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र लड़ाईयों में पीढितों की सुरक्षा से सम्बंधित था।

प्रोटोकॉल 3 :

तीसरा प्रोटोकॉल सन 2005 में एक अतिरिक्त विशेष प्रतीक को अपनाने से सम्बंधित था।

ये 4 समझौते और 3 प्रोटोकॉल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तय किये गये थे, और अब यह पूरी तरह से इस समझौते में हस्ताक्षर करने वाले 196 देशों के बीच लागू हो रहा है।

जेनेवा समझौते के नियम एवं युद्ध बंदियों के अधिकार।

ऊपर बताये गये जेनेवा समझौते के तहत सन 1949 में प्रिजनर ऑफ़ वॉर के लिए कुछ नियम बनाये गये हैं।

1 : जब कोई सैनिक दुश्मन देश में चला जाता है, तो उस देश में उस युद्धबंदी सैनिक के साथ कोई बर्बरता या भेदभाव पूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए. साथ ही उन्हें अपमानित भी नहीं किया जाना चाहिए।

2 : इसके साथ ही यदि वह घायल है, तो उसकी अच्छी तरह से देखभाल की जिम्मेदारी भी उस देश की होनी चाहिए।

3 : हालाँकि इस समझौते में एक नियम ऐसा भी है, जिसके तहत यदि उस सैनिक के खिलाफ वह देश मुकदमा चलाना चाहता है, तो वह यह कर सकता है, किन्तु उस सैनिक को कानूनी सुविधा भी दी जानी चाहिए।

4 : युद्धबंदी सैनिक के साथ कोई अत्याचार नहीं होना चाहिए और न ही उन्हें डराया धमकाया जाना चाहिए. बल्कि उन्हें खाने – पीने की चीजें भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

5 : युद्धबंदी सैनिक से पूछताछ केवल उसका नाम, यूनिट, सैन्य पद एवं नम्बर के बारे में ही की जा सकती है।

6 : जेनेवा समझौते के तहत यह सबसे जरुरी नियम है, कि जब युद्ध समाप्त हो जाये, तो उस सैनिक को दुश्मन देश द्वारा वापस लौटा दिया जाना चाहिए।

इसके अलावा यदि कोई नागरिक या कोई घायल सैनिक, जो अब युद्ध में हिस्सा नहीं ले सकता, यह नियम उनके ऊपर भी लागू होंगे।

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