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पुलिस अफसर आपकी शिकायत (FIR) लिखने से मना करदे तो क्या करे।

कोई भी व्यक्ति पुलिस के पास अपनी शिकायत लिखित या मौखिक तौर पर दर्ज करवा सकता है, हर व्यक्ति को इस बात का अधिकार है, लेकिन अक्‍सर पुलिस FIR (फर्स्‍ट इनफॉर्मेश रिपोर्ट) दर्ज करने से इनकार कर देती है, तो आप इन अधिकारी पर कार्यवाही कर सकते हो।

बिना FIR के नहीं होती कोई कार्यवाही

जब भी कोई अपराध होता है या किसी तरह की कोई दुर्घटना होती है तो सबसे पहले उस घटना की जानकारी को आपको पास के पुलिस स्‍टेशन में देनी होती है।

जानकारी मिलने पर पुलिस एफआईआर (First Information Report) दर्ज करती है और फिर एक्‍शन लेती है, शिकायत मिलने के बाद पुलिस रिपोर्ट को तैयार करती है।

जब तक घटना या किसी अपराध की FIR नहीं दर्ज होगी पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है।

IPC Section 166 ए क्या है

IPC के सेक्शन 166ए के अनुसार कोई भी पुलिस अधिकारी आपकी कोई भी शिकायत दर्ज करने से इंकार नही कर सकता।

अगर वो ऐसा करता है तो उस अधिकारी के खिलाफ वरिष्ठ पुलिस दफ्तर में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

अगर वो पुलिस अफसर दोषी पाया जाता है तो उसे कम से कम 6 महीने से लेकर 1 साल तक की जेल हो सकती है या फिर उसे अपनी नौकरी गवानी पड़ सकती है।

पुलिस अधिकारी द्वारा केस दर्ज नहीं करने व आनाकानी करने की स्थिति में संबंधित पुलिस अधिकारी के विरुद्ध IPc की धारा 166 (ए) के तहत मुकदमा दर्ज करना पुलिस अधिकारी की कानूनी बाध्यता है। अगर अधिकारी ऐसा नहीं करता तो जिसमें दोषी पाये जाने पर संबंधित पुलिस अधिकारी को दो साल तक की सजा व जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

पुलिस अधिकारी FIR दर्ज न करे तो क्या करे।

अगर पुलिस आपकी शिकायत को दर्ज करने से इनकार कर देती है तो आपके पास अधिकार है कि आप किसी सीनियर ऑफिसर के पास जाकर इन अधिकारी के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

अगर इसके बाद भी FIR दर्ज नहीं होती है तो आप CrPC के सेक्शन 156 (3) के तहत मेट्रोपॉलिटिन मजिस्ट्रेट के पास इसकी शिकायत करने के अधिकारी हैं।

आपकी शिकायत पर मजिस्ट्रेट पुलिस को FIR दर्ज करने के निर्देश देने का अधिकार रखते हैं।

यदि कोई अधिकारी आपकी एफआईआर लिखने से मना करता है या एफआईआर दर्ज नहीं करता है तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अनुसार उन पर एक्शन लिया जा सकता है।

ऑनलाइन FIR दर्ज की जा सकती है

पुलिस अगर FIR दर्ज नहीं करती है तो पीड़ित व्यक्ति अपनी शिकायत ऑनलाइन भी रजिस्टर करा सकते हैं. अपनी शिकायत ऑनलाइन रजिस्टर करने के लिए आपको अपने राज्य की पुलिस वेबसाइट पर जाना होगा।

जैसे गुजरात में https://gujhome.gujarat.gov.in (fir.gujarat.gov.in) की वेपसाइड पर ऑनलाइन FIR दर्ज करवा सकते हो।

FIR दर्ज होने के बद कार्यवाही कैसे होती है

FIR दर्ज होने के बाद तो ड्यूटी ऑफिसर Asi को घटनास्‍थल पर भेजा जाता है, सभी गवाहों के पूछताछ कर उनका स्टेटमेंट रिकॉर्ड किया जाता है।

पहले तो शॉर्ट रिपोर्ट के आधार पर पुलिस रिपोट दर्ज करती है, सुप्रीम कोर्ट के निर्दश के अनुसार पीड़ित व्यक्ति की तरफ से FIR दर्ज कराने के पहले एक हफ्ते के अंदर ही फर्स्ट इन्वेस्टिगेशन पूरी हो जानी चाहिए।

मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 के तहत गर्भवती महिलाओं को नौकरी से नही निकाला जा सकता ।

मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 के मुताबिक़ गर्भवती महिलाओं को अचानक नौकरी से नहीं निकाला जा सकता।

मालिक को पहले तीन महीने की नोटिस देनी होगी और प्रेगनेंसी के दौरान लगने वाले खर्चे का कुछ हिस्सा देना होगा।

अगर वो ऐसा नहीं करता है तो उसके खिलाफ सरकारी रोज़गार संघटना में शिकायत कराई जा सकती है। इस शिकायत से कंपनी बंद हो सकती है या कंपनी को जुर्माना भरना पड़ सकता है।

मातृत्व विधेयक (मैटरनल ऐक्ट), 2017

मातृत्व लाभ अधिनियम (मैटरनल बेनिफिट ऐक्ट), 1961 का संशोधित रूप है मातृत्व विधेयक (मैटरनल ऐक्ट), 2017।

इसे राज्यसभा से 11 अगस्त 2016 और लोकसभा से 9 मार्च 2017 को पारित किया गया, राष्ट्रपति से 27 मार्च 2017 को मंजुरी मिलने के बाद यह कानून बन गया।

उसके बाद 1 अप्रैल 2017 से मातृत्व लाभ अधिनियम/मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट पूरे भारत में लागू किया गया।

मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट (संशोधित) 2017 के मुख्य कायदा और नियम

यह महिला कर्मचारियों के रोज़गार की गारंटी देने के साथ-साथ उन्हें मैटरनिटी बेनिफिट का अधिकारी बनाता है, ताकि वह बच्चे की देखभाल कर सकें।

प्रेगनेंसी के दौरान महिला कर्मचारियों को पूरी सैलरी दी जाती है।यह कानून सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं पर लागू होता है जहां 10 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं।

24 हफ्तों की छुटी को बढ़ाकर 26 हफ्तों में तब्दील कर दिया गया है। डिलीवरी के 8 हफ्ते पहले से हीं छुटी ली जा सकती है।

पहले और दूसरे बच्चे के लिए 26 हफ्ते की मैटरनिटी लीव का प्रावधान है। तीसरे या उससे ज़्यादा बच्चों के लिए 12 हफ्ते की छुट्टी का प्रावधान है।

3 महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली या सरोगेट मताओं को भी 12 हफ्तों की छुट्टी दी जाएगी।

इस अवकाश को प्राप्त करने के लिए किसी भी महिला को उस संस्थान में पिछले 12 महीनों में कम-से-कम 80 दिनों की उपस्थिति चाहिए होती है।

अगर कोई संस्था या कंपनी इस कानून का पालन नहीं कर रही है, तब सज़ा का प्रावधान भी है।

गर्भवती महिला को छुट्टी ना देने पर सजा क्या है

गर्भवती महिला को छुट्टी ना देने पर 5000 रुपये का ज़ुर्माना लग सकता है।

अगर किसी भी संस्था द्वारा गर्भावस्था के दौरान महिला को मेडिकल लाभ नहीं दिया जाता है तब 20000 रुपये का ज़ुर्माना लग सकता है।

किसी महिला को छुट्टी के दौरान काम से निकाल देने पर 3 महीने जेल का भी प्रावधान है।

मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट के तहत रिइंबर्समेंट

मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट में संशोधन के बाद श्रम मंत्रालय ने बढाए गए 14 हफ्तों में से 7 हफ्तों की सैलरी कंपनी को इंसेंटिव के तौर पर देने का फैसला किया है।

इस रिइंबर्समेंट का लाभ वे महिलाएं उठा पाएंगी जिनकी सैलरी 15000 रु से ज्यादा होगी और वे कम-से-कम 12 महीनों से ‘ईपीएफओ’ की सदस्य होंगी।

देखा जाए तो महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह एक क्रांतिकारी कदम है लेकिन उन महिलाओं का क्या जो ठेके पर मज़दूरी करती हैं। उन महिलाओं की परेशानियों को कौन समझेगा जो अपने बच्चे को रोता हुआ छोड़कर काम करती हैं। असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं के लिए सरकार के पास क्या रणनीति है ?

मजदूरी करने वाली और छोटी जगह पर काम करती महिलाएं।

घरेलू कामगार महिलाएं, मजदूरी, खेत पर काम करती महिलाए, किसी कार्यालय पर जाडूपोछा या दूसरे काम करती महिलाए को ‘मैटरनिटी लीव’ नहीं मिलती और लिव लेने पर उनकी नौकरी चली जाती हे, अगर छुट्टी मिलती भी हे तो उन्हे इन अवकाश की कोई सैलरी नही दी जाती।

अगर प्रेगनेंसी के कारण वह महिलाए अगर काम करने नहीं जाती हैं तब उस रोज़ का पैसा काट लिया जाता है।

ऐसे में बेहद ज़रूरी है कि सरकार घरेलू कामगार महिलाओं के लिए भी कोई विधेयक लेकर आए ताकि मातृत्व में उनकी रोजगारी न चली जाए।

‘मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट’ काफी सराहनीय है, मैटरनिटी लीव की आधी सैलरी सरकार देगी यह भी सराहनीय है। लेकिन इनका पालन अभी भी सभी स्तर पर नहीं होता और कितनी प्रेगनेंट महिला और नवजात शिशु की माताएं इनका लाभ नहीं उठा पाती।

रिश्वत लेना या देना अपराध है| भ्रष्टाचार निवारण अिधिनयम, 1988।

कोई भी सरकारी कर्मचारी या सरकार द्वारा स्थापित अन्य संस्था का कर्म चारी जैसे किसी सरकारी कंपनी का कर्मचारी सरकार या सरकार की स्वामित्व वाली या सरकार की सहायता प्राप्त किसी भी संस्था का कर्मचारी, या कोई राजनेता अगर लोकसेवा या लोककाम के लिए रिश्वत लेता है, तो यह दंडनीय अपराध है।

भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम, 1988 के धारा 7,8 ,11 तथा 12।

भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम, 1988 के धारा 7,8 ,11 तथा 12 के तहत जब कोई सरकारी कर्मचारी अपना सरकारी काम करने के लिए जनता से पैसे लेता है, तो वह रिश्वत लेने का अपराध करता है।

हर सरकारी कर्मचारी कुछ निश्चित कार्य करता है जिसे करना उसकी जिम्मेदारी है। परंतु वह कर्मचारी अपना काम करने के लिए यदि पैसे या कुछ अन्य चीजें अपने लिए लेता है या किसी और के लिए लेता है ,तो वह घूस लेने का अपराध करता है।

सरकारी कर्मचारी पक्षपात करने के लिए भी घूस ले सकता है। घूस देने वाले को घूस लेने वाले का सहयोगी समझा जाता है। घूस लेने के लिए किसी को प्रेरित करना या उकसाना भी अपराध है।

रिश्वत लेने पर दंड का प्रावधान

इस अपराध का दंड कम से कम 6 महीने से लेकर 5 साल तक का कारावास तथा जुर्माना हो सकता है।

कानून के मुताबिक अब तक रिश्वत लेना ही अपराध माना जाता था, लेकिन अब रिश्वत देना भी अपराध की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है.

अपने फायदे या अप्रत्यक्ष रूप से काम को प्रभावित करने के लिए रिश्वत देने के आरोपी पर 3 से लेकर 7 साल तक जेल और जुर्माना लगाया जा सकेगा.

IPC section 171E|धारा 171ई

171ई के तहत घूसखोरी के लिए सजा, जो कोई रिश्वतखोरी का अपराध करेगा, उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास, जिसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माना , या दोनों से दंडित किया जाएगा।

अगर रिश्वत परितोषण में भोजन, पेय, मनोरंजन के रूप में लिया जाता है तो बशर्ते रिश्वतखोरी को केवल जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

शाम के वक्त महिलाओं की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो सकती।

कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर, सेक्शन 46 के तहत शाम 6 बजे के बाद और सुबह 6 के पहले भारतीय पुलिस किसी भी महिला को गिरफ्तार नहीं कर सकती, फिर चाहे गुनाह कितना भी संगीन क्यों ना हो।

अगर पुलिस ऐसा करते हुए पाई जाती है तो गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत (मामला) दर्ज की जा सकती है। इससे उस पुलिस अधिकारी की नौकरी खतरे में आ सकती है।

शाम को कोई भी महिला पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन जाने से इनकार कर सकती हैं। अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 160 के तहत महिलाओं को पुलिस स्टेशन में पूछताछ के लिए नहीं बुलाया जा सकता।

इसके तहत महिला कांस्टेबल या महिला के परिवार के किसी सदस्य की उपस्थिति में घर पर ही पूछताछ की जा सकती है।

आरोपी महिलाओं के अधिकार क्या है

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक किसी भी महिला को सूरज ढलने के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

अधिकतर महिलाओं को यह जानकारी नहीं होगी कि महिला सिपाही भी उन्हें रात में गिरफ्तार नहीं कर सकतीं।

अपराध गंभीर है तब भी पुलिस को लिखित में मजिस्ट्रेट को बताना होगा कि आखिर क्यों रात में गिरफ्तार करना ज़रूरी है।

अगर आरोपी महिला है तो, उसके साथ उसकी गरिमा और शालीनता का ध्यान रखना अनिवार्य है। उस महिला की कोई भी चिकित्सा जांच प्रक्रिया किसी महिला द्वारा या किसी दूसरी महिला की उपस्थिति में ही की जानी चाहिए।

IPC Section 186| आईपीसी धारा 186 क्या है, धारा में सजा का प्रावधान।

आईपीसी धारा 186 का मतलब लोक सेवक के लोक कॄत्यों के निर्वहन में बाधा डालना या किसी सरकारी काम में रूकावट बनना।

भारतीय दंड संहिता की धारा 186 के अनुसार, जो भी कोई किसी लोक सेवक के सार्वजनिक कॄत्यों के निर्वहन में स्वेच्छा पूर्वक बाधा डालेगा।

तो इस धारा के मुताबित उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे तीन महीने तक बढ़ाया जा सकता है, या पांच सौ रुपए तक का आर्थिक दण्ड, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

धारा 186 के तहत लागू अपराध

लोक सेवक के लोक कॄत्यों के निर्वहन में बाधा डालना, मतलब सरकारी कार्य में विक्षेप् करना, किसी सरकारी अधिकारी के कामकाज में उनकी ड्यूटी में बाधा डालने जैसा अपराध।

IPC की धारा 186 में सजा (Punishment) क्या होगी।

व्यक्तित्व द्वारा सरकारी काम में रूकावट को अपराध माना गया है , इसके लिए दंड का निर्धारण भारतीय दंड संहिता में धारा 186 के तहत किया गया है | यहाँ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 186 में ऐसा अपराध करने पर  3  माह तक का कारावास या 500 रुपए आर्थिक दण्ड, या दोनों दिए जा सकते है ।

IPC (आईपीसी) की धारा 186 में जमानत  (BAIL) का नियम

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 186 में अपराध की सजा के बारे में एक जमानती और गैर-संज्ञेय अपराध बताया गया है |

यहाँ आपको मालूम होना चाहिए कि जमानतीय अपराध होने पर इसमें जमानत मिल जाती है  क्योकि इसको CrPC में गैर-संज्ञेय श्रेणी का जमानतीय अपराध में बताया गया है।

अपराधलोक सेवक को उसके सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन में बाधा डालना
सजा 3 महीने या 500rs जुर्माना या दोनों
जमानतजमानतीय-जमानत मिल सकती है
संज्ञानगैर – संज्ञेय
अदालती कार्रवाईकोई भी मजिस्ट्रेट में
According to Section. 186 – “Obstructing public servant in discharge of public functions”–

RTI कैसे करे, माहिती अधिकार अधिनियम में कोन कोन सी धारा का उपयोग होता है।

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आप किसी भी गवर्नमेंट विभाग में अपनी एप्लीकेशन जन सूचना अधिकारी को दे सकते हैं।

अगर आपको एप्लीकेशन लिखनी नही आती तो आप इसके लिए जन सूचना अधिकारी से सहायता प्राप्त कर सकते हैं आप इस एप्लीकेशन को लिखने के लिए किसी भी स्थानीय भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं।

एक बात का ध्यान हमेशा रखें जब भी आपको एप्लीकेशन जन सूचना अधिकारी को दें तो उसकी पहले एक ज़िरोक्स कॉपी जरूर करवा लें और उस पर जन सूचना अधिकारी के साइन जरूर करा लें इससे आपके पास पक्का सबूत हो जाएगा।

ऑनलाइन RTI फाइल करने की प्रक्रिया

ऑनलाइन RTI फाइल करने के लिए आपको ऑफिसियल वेबसाइट www.rtionline.gov.in में जाना है।

ऑनलाइन फॉर्म भरने के लिए आपको सबसे पहले Submit Request के बटन को क्लिक करना होगा जिसके बाद एक पेज खुलेगा जिसमे सारी गाइडलाइन्स होगी|

गाइडलाइन्स को ध्यान से पढ़े, और उसके बाद आपको confirm करना है की आपने पूरी guidelines पढ़ ली है फिर Submit पर क्लिक करें |

उसके बाद आपके सामने एक फॉर्म खुल कर आएगा। इस फॉर्म को आप 2 भाषाओँ हिंदी या इंग्लिश में अपनी सुविधा के अनुसार खोल सकते हैं।

आपको यहाँ जिस department से जुडी जानकारी चाहिए उसके अनुसार फॉर्म को पूरा भरें, यहाँ पर आपको ध्यान रखना है की फॉर्म में सभी detail सही होनी चाहिए |

बाद में जरुरी डॉक्यूमेंट भी अपलोड कर सकते है।

अब एक बार फिर यहाँ सबसे नीचे आपको submit button मिलेगा उस पर क्लिक करें।

Submit करने के बाद आपको इस फॉर्म का एक रिसीप्ट मिलेगा आप इस receipt को store कर के रख लें या फिर प्रिंटआउट कर के निकाल लें |

जब आप इस फॉर्म की status चेक करेंगे तब आपको इस रिसीप्ट की जरुरत पड़ेगी |

ऑफलाइन RTI कैसे फाइल करें।

ऑफलाइन आवेदन करने के लिए पहले आप इसका पता लगा लें आप किस संस्थान की जानकारी लेना चाहते हैं |

जब आप ये निर्णय लें ले की कौन से विभाग की जानकारी चाहिए और वह माहिती कोन से विभाग में से मिल सकती हे उसके बाद एक सफ़ेद पेपर शीट में आवेदन लिखें और सुचना अधिकारी को जमा कर दें |

आपको हर विभाग में एक “लोक सुचना अधिकारी” मिलेगा जिसे आप अपना आवेदन लिख कर दे सकते हैं।

जब आप आवेदन लिखें तो इस लाइन को Subject(विषय) की के सामने जरूर लिखें “आर टी आई अधिनियम 2005 के तहत सुचना की तलाश।

आप अपना आवेदन इंग्लिश या हिंदी किसी भी भाषा में लिख कर दे सकते हैं |

आवेदन पूरा लिख लें तो उसमे आवेदन की तारीख और fees के 10 Rs. का postal order साथ में जरूर attach करें जो की इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए जरुरी है |

जो लोग गरीबी रेखा के निचे आते हैं उन्हें 10 Rs. का fees देने की जरुरत नहीं है लेकिन उन्हें BPL सर्टिफिकेट की एक कॉपी साथ में attach करना पड़ेगा |

आवेदन पत्र में अपना पूरा नाम और पता लिखें, साथ ही अपना साइन भी करें और इसके बाद registered पोस्ट के जरिये इसे सम्बंधित कार्यालय में भेज दें |

RTI से संबंधित जानकारी कितने दिन में मिल जाती है ?

आरटीआई से संबंधित आवेदन पत्र की जानकारी आपको 30 दिन के अंदर मिल जानी चाहिए अगर नहीं मिली तो आप कोर्ट में अपील करने का अधिकार भी रखते हैं।

RTI में कौन- कौन सी धारा का उपयोग किया है।

धारा 6 (1) : RTI का आवेदन लिखने की धारा है।

धारा 6 (3) : अगर आपका आवेदन गलत विभाग में चला गया है, तो वह विभाग इस को 6 (3) धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा।

धारा 7(5) : इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता।

धारा 7 (6) : इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन में नहीं आता है तो सूचना निशुल्क में दी जाएगी।

धारा 18 : अगर कोई अधिकारी जवाब नही देता तो उसकी शिकायत सूचना अधिकारी को दी जाए, या अदालत में फरियाद कर सकते हो।

धारा 8 : इस के अनुसार वो सूचना RTI में नहीं दी जाएगी जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा कर सकती हे, या विभाग की आंतरिक जांच को प्रभावित करती हो।

धारा 19 (1) : अगर आप की RTI का जवाब 30 दिन में नहीं आता है। तो इस धारा के अनुसार आप अपील अधिकारी को प्रथम अपील कर सकते हो।

धारा 19 (3) : अगर आपकी प्रथम अपील का भी जवाब नही आता है तो आप इस धारा की मदद से 90 दिन के अंदर अपील अधिकारी को दूसरी अपील कर सकते हैं।

सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) क्या है| right to information act 2005

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सूचना का अधिकार अधिनियम भारत की संसद द्वारा पारित एक कानून है, जो 12 अक्टूबर, 2005 को लागू हुआ।

यह कानून नागरिक को जानने का अधिकार या सूचना लेने के अधिकार का हक देता है (Right To Information)।

इन कानून के तहत आप सरकार या सरकारी अधिकारी से कोई भी सूचना मांग सकते हैं, सरकारी निर्णय की प्रति ले सकते हैं, सरकारी दस्तावेजों का निरीक्षण कर सकते है, सरकारी कार्य का निरीक्षण कर सकते हैं।

RTI Act भारत के सभी नागरिकों पर लागू है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में 6 अध्याय तथा कुल 31 धाराएं हैं।

सूचना अधिकार के अन्तर्गत कोन सी माहिती ले सकते है।

कार्यो, दस्तावेजों, रिकार्डो का निरीक्षण कर सकते है।

दस्तावेज या रिकार्डो की प्रस्तावना। सारांश, नोट्स व प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर सकते है।

सरकारी सामग्री के प्रमाणित नमूने ले सकते है।

सूचना अधिकार के अन्तर्गत माहिती कोन से रूप में मिल सकती है।

प्रिंट आउट, डिस्क, फ्लाॅपी, टेप, वीडियो कैसेटो के रूप में या कोई अन्य इलेक्ट्रानिक रूप, या दस्तावेज और डॉक्यूमेंट पेपर में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

सूचना अधिकार अधिनियम का उद्देश्य

सूचना का अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य नागरिकों को सशक्त बनाना, सरकार की कार्यशैली में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना, भ्रष्टाचार को रोकना तथा हमारे लोकतंत्र को सही मायने में लोगों के लिए कार्य करने वाला बनाना है।

यह कनून सरकार को जनता के लिए और अधिक जवाबदेह बनाता है, यह अधिनियम नागरिकों को सरकार की गतिविधियों के बारे में जागरूक करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

आरटीआई के लाभ

RTI के माध्यम से कोई भी भारतीय नागरिक किसी भी गवर्नमेंट विभाग से जानकारी प्राप्त करने के लिए एप्लीकेशन दे सकता है, यह एक आम नागरिक का अधिकार है जो सरकार और प्रशासन के काम को पारदर्शक बनाता है।

आरटीआई के आवश्यक नियम

यदि आप भारत के नागरिक है तो आप इसके अंतर्गत आवेदन करके किसी भी सरकारी दफ्तर से महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

आप सभी केंद्रीय राज्य और स्थानीय संस्था से जानकारी हासिल कर सकते हैं जिनकी स्थापना संविधान के अंतर्गत हुई है। इस अधिनियम से बहुत सारे संस्थानों को अलग रखा गया है।

आवेदक को आवेदन करते समय अर्जी सटीक सरकारी संस्था के नाम जमा कर पड़ती है।

आवेदक को माहिती जल्द से जल्द प्राप्त करने के लिए आवेदन पत्र जिस विभाग की माहिती प्राप्त करनी हे, वह विभाग में ही आवेदन पत्र भेजे।

आवेदक को आवेदन के साथ-साथ शुल्क भी भेजना होता है किसी भी व्यक्ति के लिए यह रकम 10 रूपए की होती है और बीपीएल कार्ड धारकों के लिए यह रकम माफ कर दी गई है।

आरटीआई के अंतर्गत आवेदन करने के बाद 30 दिन के अंदर अंदर परिणाम मिल जाता है और यदि महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंट हो तो इसका परिणाम 48 घंटे में भी प्राप्त किया जा सकता है।

अगर आवेदन में बात सही तरीके से नहीं भरी या फिर डिटेल अधूरी हो या उसके अलावा आवेदन की राशि गलत भर दी गई है तो आवेदक का आवेदन रिजेक्ट कर दिया जाता है।

RTI के अंतर्गत आने वाले विभाग जहाँ से सूचना मांगी जा सकती है।

अधिकार का प्रयोग आप सभी गवर्मेंट डिपार्टमेंट, प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमत्री कार्यालय, बिजली कंपनियां, बैंक, स्कूल, हॉस्पिटल, राष्ट्रपति कार्यालय, पुलिस, बिजली कंपनियां, कलेक्टर ऑफिस, PWD, नगर पालिका, तालुका पंचायत, जिल्ला पंचायत, DDO, तलाटी इत्यादि RTI एक्ट के अंतर्गत आते है|

RTI आवेदन शुल्क (RTI Application fee)

सूचना के अधिकार (RTI) के लिए 10 रूपये का शुल्क निर्धारित किया गया है, गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों के लिए यह निशुल्क है |

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